8505 अफसरों की फौज उतारकर सरकार ने चला बड़ा दांव
कोलकाता। मतदाता सूची के एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग और ममता सरकार के बीच जारी महायुद्ध अब निर्णायक मोड़ पर पहुँच गया है। सोमवार, 9 फरवरी को भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ इस मामले पर दोबारा सुनवाई करेगी।
इस अहम सुनवाई से ठीक पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक खेलते हुए चुनाव आयोग को सूचित किया है कि राज्य सरकार एसआईआर अभियान की निगरानी के लिए अपने 8,505 ग्रुप-बी अधिकारियों को तैनात करने के लिए तैयार है। आयोग के आरोपों का करारा जवाब सरकार का यह कदम चुनाव आयोग के उन दावों के प्रतिवाद के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें आयोग ने कोर्ट को बताया था कि राज्य सरकार ने इस विशाल अभियान के लिए केवल 80 ग्रेड-2 अधिकारी उपलब्ध कराए हैं।
आयोग का आरोप था कि उच्च अधिकारियों की कमी के कारण उसे दूसरे राज्यों के माइक्रो-ऑब्जर्वर नियुक्त करने पड़े। अब हजारों अधिकारियों की उपलब्धता की सूची सौंपकर ममता सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि संसाधनों की कमी राज्य की ओर से नहीं, बल्कि समन्वय की कमी आयोग के स्तर पर है। अदालत में खुद पक्ष रख सकती हैं मुख्यमंत्री सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सोमवार को एक बार फिर व्यक्तिगत रूप से सुप्रीम कोर्ट में उपस्थित हो सकती हैं। इससे पहले 4 फरवरी को उन्होंने खुद अपनी दलीलें पेश कर सबको चौंका दिया था। ममता बनर्जी ने कोर्ट में कड़ा विरोध जताते हुए कहा था कि बंगाल को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है और मामूली स्पेलिंग मिस्टेक के आधार पर लाखों वैध मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं। उन्होंने इसे लोकतंत्र को बुलडोज करने की कोशिश करार दिया था। सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमल्य बागची और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ इस मामले में चुनाव आयोग और राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के जवाबों की समीक्षा करेगी। पिछले आदेश में कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि एक भी वास्तविक मतदाता का नाम सूची से बाहर नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने आयोग को निर्देश दिया था कि वह नोटिस जारी करते समय अधिक संवेदनशीलता बरते। सोमवार की सुनवाई यह तय करेगी कि क्या 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के इस शुद्धिकरण अभियान पर कोर्ट स्टे लगाता है या नई शर्तों के साथ इसे जारी रखने की अनुमति देता है।